मंगलवार, 8 जून 2010

overtime

ओवर टाइम
और हाँ-
अभी-अभी तो आया था
मिल की टूटी खिड़की से
तुम्हारी यादों का एक झोंका
रात है !...किन्तु सन्नाटा नहीं
चिल्ला रहीं हैं मिल की मशीनें
कर्णकटु...बेलगाम...जानलेवा...
और मैं, ओवर टाइम पर हूँ 
अभी मैं आ नहीं सकता, तुम्हारे पास
परिस्थिति और मालिक-
दोनों ही बेरहम हैं.
बार-बार मत भेजो तुम
यादों की बैसाखी
नहीं गिरूंगा मैं...
मैं टूट नहीं सकता
मेरे साथ हैं कई हाथ
कई चेहरे!
मेरी तसल्ली के लिए
लेकिन एक दिन आऊंगा
मैं तुम्हारे पास
ज़रूर आऊंगा मैं...
मेघदूत का यक्ष नहीं हूँ
किसी दैवी शाप से बाधित नहीं हूँ
मैं तो हूँ मजदूर!
नयी सदी का...
नए युग का...





















 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बार-बार मत भेजो तुम
    यादों की बैसाखी
    नहीं गिरूंगा मैं.


    संवेदनशील रचना ...अच्छी प्रस्तुति ..बाकी भी सब रचनाएँ पढ़ीं ...पसंद आयीं ...


    कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .





    http://geet7553.blogspot.com/

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  2. एक मजदूर की व्यथा , व्यथित कर गयी । उम्दा प्रस्तुति।

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  3. बेहद सुन्दर रचना...एक दर्द ..काम का मजबूरी का... समय के अभाव का... एक मेहनतकश इंसान का दर्द ..बहुत खूब...
    मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है..
    अमृतरस
    My~Life~Scan

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  4. 'मिथ ऑफ सिसिफस' सा अपने-अपने हिस्‍से का बोझ ढोता जीवन.
    (शब्‍द पुष्टिकरण हटाने पर कृपया विचार करें.)

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  5. ओवर टाईम किसी की मजबूरी किसी का फ़ायदा।

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  6. और अजनबी भी नहीं हो....
    शुभकामनायें !

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